आंसू कहाँ बहाने निकले

बसंत कुमार शर्मा

रचनाकार- बसंत कुमार शर्मा

विधा- गज़ल/गीतिका

जनता को बहकाने निकले
नेता वोट जुटाने निकले

मंचों पर जब जंग छिड़ गयी
क्या क्या तो अफसाने निकले

नेता,अफसर,चमचों के घर,
नोट भरे तहखाने निकले

कहते थे घर-बार नहीं, पर
उनके बहुत ठिकाने निकले

जब गरीब को देना था कुछ
घुने हुए के दो दाने निकले

दिखी रौशनी कहीं शमा की
जलने को परवाने निकले

फैंक रहे थे मुझ पर पत्थर
सब जाने पहचाने निकले

ढूंढ रहे थे मंदिर मस्जिद
गली गली मयखाने निकले

अच्छे थे आँखों में आँसू
हम भी कहाँ बहाने निकले

Views 65
Sponsored
Author
बसंत कुमार शर्मा
Posts 71
Total Views 938
भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia