आंखे

विजय कुमार नामदेव

रचनाकार- विजय कुमार नामदेव

विधा- गज़ल/गीतिका

दो आंखों की जेल में उसकी हम गिरफ्तार रहे हैं।
एक जमाने से इस दिल में वो सरकार रहे हैं।।

पूछ रहे हो मुझसे तुम क्या तुमने प्यार किया है।
एक अनार के पीछे बरसों हम बीमार रहे हैं।।

शक्ल नहीं देखी बरसों से कभी किसी आईने में।
एक जमाना था जब हम भी पानीदार रहे हैं।।

हम इकलौते चल ना सकेंगे सारा जहां बदलने को।।
ऊपर से ये बीवी बच्चे और घर बार रहे हैं।।

होश संभाला जबसे बेशरम लगे हैं दुनियादारी में।
जीवन के एक-एक पल अपने तो मंझधार रहे हैं।।

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विजय कुमार नामदेव
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सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि के, मेरी तुम संपर्क- प्रतिभा कॉलोनी गाडरवारा मप्र चलित वार्ता- 09424750038

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