असलियत

umesh mehra

रचनाकार- umesh mehra

विधा- गज़ल/गीतिका

भरोसा था कि आइना बतायेगा मुझे फितरत उनकी ।
बड़ा ही शातिर निकला न बताई असलियत उनकी ।।
पहचानते कैसे कि चेहरे पे नकाब लगा रक्खा था ।
मुस्करा कर कत्ल करने की है आदत उनकी ।।
गले लगाया था मुझे मेरा हमनवाज बनकर ।
क्या पता था कि खंजर छुपाने की है आदत उनकी ।
झूठ को यूँ पेश किया कि सच ही समझ बैठे हम।
बेगैरत हैं वो कि इमान बैचने की है आदत उनकी ।।
झक सफेद कपड़ों पर दाग भी नज़र नहीं आया ।
हंस के लिवास में है बगुले सी सूरत उनकी ।।
बाजार में खोटे सिक्के भी चला लेते हैं आशिक ।
नकली सामान बैचने मैं है महारत उनकी ।।
सुना है कि पूछता नहीं है उन्हे आजकल कोई ।
बेपर्दा हो हो गई है लोगों में असलियत उनकी ।।
उमेश मेहरा
गाडरवारा (मध्य प्रदेश )
9479611151

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