अलाव

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

🌹🌹🌹🌹
देहाती दुनिया में पुरातन,
प्रभावशाली तकनीक है अलाव।
जो गरीबों को कंपकपाती,
ठंढ़ की मार से करती है बचाव।
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श्वेत चादर ओढ़े कोहरे के,
डँसती शीतलहर का फैलाव।
चिलचिली सर्द भरी धूँध,
से भरे मौसम का ये बदलाव।
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ठंढ़ी-ठंढ़ी शीतकालिन,
पछुआ सर्द हवाओं का बहाव।
देह के अस्तित्व पर चुभती,
सुई सी ठिठुरनों का दबाव।
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अग्नि के चारो तरफ बैठे,
लोगों का संकुचित घेराव।
उठती चिंगारियों की लपटों,
लहलहाती आँच का गर्माव।
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धुआँ से आँखों में हो रहे,
किरकिरी,आँसुओं का छलकाव।
ठंढ़ से मरती जिंदगियों में,
जोश भरती उष्णता का प्रभाव।
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आग में जला आलू,बैगन,टमाटर
की चटनी,चोखा का स्वाद लाजबाव।
गरम-गरम धी में
डूबा,लिट्टी में सत्तु का भराव।
🌹
प्रेम रसों का इसमें,
थोड़ा-थोड़ा सा छिड़काव।
इसके सामने फीका है,
मुगलई बिरयानी और पुलाव।
🌹
किस्से सुनाते बुढ़े-बुजुर्ग अपने
जवानी की देकर मुछों पर ताव।
ध्यान से सुनते सभी बड़े-बच्चे,
ऐसे कि जाने कितना हो सुनने में चाव।
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कोई सुनाता,गीत,सोहर,
तो कोई जोक, लतीफे बेहिसाब।
खत्म करता हुआ ,
रिस्तों में पड़ा हुआ अलगाव।
🌹
छोटे-बड़े सबके चेहरे पर,
अन्जाने से खुशियों का ठहराव।
महिला-पुरूष,छोटे-बडे सभी,
बैठे हैं एक साथ मिटाकर भेदभाव।
🌹
खुश मिजाज हैं सभी मस्त,
बदला-बदला सा सबका स्वभाव।
आँखों में जाने छुपें हुए,
छलक उठे कितने तरह के भाव।
🌹
आते-जाते लोग भी आग देख,
रूक कुछ पल को डालते पड़ाव।
कोई सेकता हाथ और पाव,
कोई करता रिस्तों का सेंकाव।
🌹
प्रसुति महिला के लिये,
संजिवनी का काम करता अलाव।
खाट के नीचे रखकर,
करती कमर का सेकाव।
🌹
कमर दर्द की शिकायत में,
सुपर आयोडेक्स है इसका सुझाव।
ग्रामिण क्षेत्रों में ठंढ़ से बचने का,
अलाव सबसे नयाब नुस्खा है जनाब।
🌹🌹🌹🌹—लक्ष्मी सिंह💓☺

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लक्ष्मी सिंह
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