अरे धूर्त!

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

रचनाकार- मुकेश कुमार बड़गैयाँ

विधा- कविता

अरे धूर्त……
धिक्कार है है तुम पर…
कौऐ को भी पीछे कर गये….
वो बेचारा वक्त का मारा..
कम से कम स्वच्छ भारत का सच्चा सिपाही
तुम…..
गंदगी का अंबार लगा रहे–
इर्द-गिर्द चारों तरफ
मन मैला है
वाणी बनावटी
थमी नाली की सड़ाँध भी—
काम तुम्हारे चालाक लोमड़ी से
थोडा बहुत रहम करना कौऐ पर…
उसके पेट पर लात न मारना..
मिले समय तो भीतर बैठा एक इंसान
जब सुबह उठो तो उसे भी जगाना
हो सके तो बस कौऐ का हिस्सा न खाना
उसका काम उसे करने दो तुम अपना चरित्र निभाना।
अरे धूर्त! तुम पर फिर धिक्कार न होगा
कौऐ को है सदा सलाम।

Sponsored
Views 32
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
मुकेश कुमार बड़गैयाँ
Posts 23
Total Views 847
I am mukesh kumarBadgaiyan ;a teacher of language . I consider myself a student & would remain a student throughout my life.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia