अब नफ़रत की धुंध छँटने लगी। जिन्दगी तुझमें फिर सिमटने लगी।।

Wasiph Ansary

रचनाकार- Wasiph Ansary

विधा- गज़ल/गीतिका

अब नफ़रत की धुंध छँटने लगी।
जिन्दगी तुझमें फिर सिमटने लगी।।

चूड़ियों की अजीब ख्वाईश है।
शाम होते ही ये खनकने लगी।।

आ भी जाओ न ख्वाब में मेरे।
हिज्र सी रात मुझको डसने लगी।।

ईश्क में अश्क़ क्यूँ मेरे छलके।
सोचकर और मैं सिसकने लगी।।

कोई रोके न अब कदम मेरा।
हद से ज़्यादा मैं अब बहकने लगी।।

है ख़ुदा भी नाराज़ सा मुझसे।
उससे ज़्यादा मैं नाम रटने लगी।।

ये जो नफ़रत है जान ले लेगी।
आ गले मौत अब लिपटने लगी।।

ये जो "वासिफ" है बेवफ़ा ही है।
बावफ़ा ख़ुद ही इसपे हँसने लगी।।

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