अपने ही सपनो के नवाब बन बैठे थे कभी

Omendra Shukla

रचनाकार- Omendra Shukla

विधा- कविता

अपने ही सपनो के नवाब बन बैठे थे कभी
ख्वाव्बों का एक बाग़ बून बैठे थे कभी
गफलत हुई इन निगाहो का
जाम बून बैठे थे कभी,
अश्को को कुछ तालीम यू दी थी
की रुसवाईयाँ महफ़िलों में न करना कभी
अनजान सितमगर है वो जज्बातों का
बेवजह परेसान न करना कभी ,
फर्क न समझ पाया बातो और जज्बातों का वो ,
की टूटे हुए हर लफ्ज को उसके
हमने सहादत दी थी कभी ,
वास्ता दे के वफाओ का कुछ यू,
तंज कस्ती रही इस नाचीज की मोहबत पे
कीमत समझ आई सितम की कुछ उन्हें आज
जो गुमनाम महफ़िलो में छिपाए थे हमने कभी ,
नाम मोहब्बत का करना था
बदनाम तुम्हे कैसे होने देते
यकीं कैसे कोई करता कोई ,
उन सुर्ख भीगी पलकों का
अंगारे ही थे जिनमे तेरी मोहब्बत के दर्दो का
जिंदगी बेखबर थी उन राहों से ,
की वफाओ की मंजिल भी तन्हाई होती है कभी ,
अपनी मोहब्बतों का शागिर्द बन
दुसरो की तन्हाईयों का सहारा बन बैठे थे कभी
की अपने ही सपनो के नवाब बन बैठे थे कभी |

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Author
Omendra Shukla
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नाम- ओमेन्द्र कुमार शुक्ल पिता का नाम - श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल जन्म तिथि - १५/०७/१९८७ जन्मस्थान - जिला-भदोही ,उत्तर प्रदेश वर्तमान पता - मुंबई,महाराष्ट्र शिक्षा - इंटरमीडिएट तक की पढाई मैंने अपने गांव के ही इण्टर कॉलेज से पूर्ण किया,तदनुसार मै इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढाई खत्म करने के बाद मै नौकरी के सिलसिले में मुंबई आया तथा पुणे के सिम्बायोसिस कॉलेज से पत्राचार के माध्यम से म.बी.ए. । निवास- मुंबई , महाराष्ट्र लेखन - कविता ,गजल ,हाइकू ,उपन्यास ,कहानी ,गीत । मो. न. -9702143477

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