अपने वजूद की पहचान कर चला है

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- कविता

आज दिल फिर से मुकम्मल हो चला है
तेरे यादो की गली से मुह मोड़ के चला है

उधार की खुशिया ..जो तुझसे होकर गुजरी
किसी जमाने मे जो थी सिर्फ तुझमे सिमटी

उल्फत के वो फसाने ..जिन्हे गुजरे हुए जमाने
नमी जिनको याद कर हो ..मुह मोड़ के चला है

दामन तेरी उल्फत का बस छोड़ कर चला है
बस !खुद के वजूद की पहचान कर चला है

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

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