**अपना प्रकाश स्वयं बनो**

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

**अपना प्रकाश स्वयं बनो**
निशाने पर होते है लोग,किससे कब गलती हो ?
अच्छाई का जिक्र ही नहीं होता है,वो तो सब में हैं,

इन्हीं पर पत्रकारिता जिंदा है,
वरन् दुनिया या संसार है कहाँ ?

फैल जाती है बुराइयां,मिनटों में ,
बँट जाते है तौर-तरीके
वरन् बुराई को माध्यम है ही कहाँ,

मालूम नहीं "दो वक्त की रोटी"को जिंदगी, इतनी क्यों ? उलझ जाती है,
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
यह दुनिया झूठी शान के खातिर आश्रितों , के हक को क्यों? निंगल जाती है,

दोहा:-*************************
बरस रहा रे सब ओर,भिग्या मिले न कोई ओर,
ओढ़ रहे ओढ़नी सब ओर,उतारे कैसे कोई ओर
अर्थात् :-*********************
परमात्म् प्रेम सब तरफ फैला हुआ है,
ये प्राकृतिक छटा,बहते छरने,पशु-पक्षी,
खिलते पुष्प सब आयोजन है समझने वाले के लिए,
इनसे आनंन्दित कोई महसूस नहीं होता,
.
सब लोग अंधविश्वास, कुरीतियों, परम्पराओं रुपी चादर ओढ़ कर बैठा हुआ है,
और इस तमन्ना में जीवन जी रहा है कि इस चादर को कोई ओर उतारने आएगा,
***अपना प्रकाश स्वयं बनो***

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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