अपना-अपना नज़रिया

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- कविता

दिल दिया जिसको हो गया रक़ीब।
वो राजदां था दिल के बहुत क़रीब।।

भुला दिया हमें कसमें-वादे तोड़कर।
अर्श से गिरा टूट मेरा तारा-ए-नशीब।।

कौन जाने किसी को बिन आज़माए।
परीवश होते हैं दिल के कितने ग़रीब।।

खुश है दीवाना होकर चाँद का चकोर।
वो बेचारा न जाने है कितना बदनशीब।।

आँखों में फ़रेब का समन्दर बसाए हुए।
मिला था हमें भी एक बेवफ़ा अज़ीब।।

कर्मे-सिला है नेकी और रुसवाई मियाँ।
ख़ुदा खैर करे उनकी न जाने तहज़ीब।।

बेवफ़ाई कर वफ़ा की उम्मीद न करना।
जैसी करनी वैसी भरनी है यहाँ साहिब।।

ज़िन्दगी में फूल चाहिए या काँटें दोस्त।
मिले वही है यहाँ जैसी मन की तरक़ीब।।

सिला मुहब्बत का मुहब्बत ही कर यकीं।
आम की गुठली आम उगाए है मुख़ातिब।।

"प्रीतम"चाँद को देखे चाहे कोई दाग़ को।
अपना-अपना नज़रिया है अज़ीबो-ग़रीब।।

राधेयश्याम बंगालिया "प्रीतम"
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