अधूरे ख्वाब

umesh mehra

रचनाकार- umesh mehra

विधा- गज़ल/गीतिका

कुछ आरज़ू अधूरी है कुछ ख्वाब अभी बाकी है ।
जिंदगी है थोड़ी और काम बहुत बाकी है ।।
हसरतो के सिलसिले रूकते नहीं है उम्र भर ।
ढलकी है दोपहर अब शाम अभी बाकी है ।।
माथे की सिलवटें ये कहतीं हैं रात-दिन।
बिटिया हुई सयानी,बिबाह अभी बाकी है ।।
बेटे ने अब पहनें है,जूते मेरे पाँव के।
परवाज देने को उसके,पंख अभी बाकी है ।।
जिंदगी गुजार दी, किराये के मकानों में ।
ढलती हुई उम्र में खुद की छाँव अभी बाकी है ।।
ठहर जाता ए वक्त कुछ देर के लिए ही सही ।
उलझनें है बहुत ही, मसले तमाम बाकी है ।।
जिंदगी है कि आशिक,थमती कहाँ है एक पल।
घूमें बहुत बजार में,बस कफ़न का सामान अभी बाकी है।।
उमेश मेहरा ' आशिक '
गाडरवारा
9479611151

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