अधजले दीये की लौ से.…

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- कविता

अधजले दीये की लौ से.…
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अधजले दीये की लौ से,
जल उठा पवन,
और आया..एक झौंका बन ।
रच दिया चक्रव्यूह,
कहने लगा मौन बन,
…. हट जा पथ से !

पर नही,….
नहीं हटूंगा मैं इस पथ से,
मैं रक्षक हूँ इस लौ का,
इसे जलाया है मैंने किसी की याद में प्रेमाकुल होकर,
और जी रहा हूँ.. इसी के सहारे, इस तम-गर्त में ।

एकाएक ……..
न जाने कौन सा ख़याल उसका,
एक बूँद बन टपक पडा उस लौ पर,
मेरी ही आँख से,
और…….
दीया वीरान हो चला ।

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** हरीश**चन्द्र**लोहुमी**
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हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

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6 comments
  1. वाह अनुपम अभिव्यक्ति … हार्दिक बधाई आदरणीय हरीश जी।