अदब

Ramkumar Ramarya

रचनाकार- Ramkumar Ramarya

विधा- गज़ल/गीतिका

किसी' इस्कूल की बेजान सी' मजलिस जैसे!!
अदब है शहरे ख़मोशां की परस्तिश जैसे!!

तमाम चेहरों से मुस्कान ऐसे ग़ायब है,
पढ़ा रहा हो छड़ीदार मुदर्रिस जैसे!!

न जाने कैसे काटते हैं रहबरी में गला,
कि कोई मेमना हो मुफ़्त का मुफ़लिस जैसे!!

@ कुमार ज़ाहिद,
10.2.17, 6.04

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Ramkumar Ramarya
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साहित्य मृगतृष्णा बन कर मन को दौड़ा रहा है। कई शेरों ने झपट्ट मारे, घायल किया, मरणासन्न हुआ, पर चौकड़ी नहीं छोड़ी। अतः प्रस्तुत हूँ! 👍☺😊

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