अंतर्वेदना

Rita Singh

रचनाकार- Rita Singh

विधा- कविता

बहुत रोई थी उस दिन मेरी संवेदना
जब मेरी माँ ने
मेरी होने वाली बहन को
उसके जन्म लेने से पहले ही
अपने गर्भाश्य की छोटी सी
दुनिया से निकाल
चिर् स्थाई नींद में सुला दिया था ।
मैं सपने संजोये बैठी थी
उस सचमुच की भावी गुड़िया के साथ
गुड़िया- गुड्डा खेलने के ।
मैंने अपने सभी खिलौनों में से
कुछ प्रिय खिलौने उसके लिए
अलग निकाल कर रख दिए थे ,
जैसे वो ढम ढम करता हुआ बंदर,
हाथ ऊपर उठाकर नाचता हुआ भालू ,
छोट-छोटे बर्तनों वाला किचन सैट…।
किंतु ये क्या !
मुझे असीम प्यार देने वाली
मेरी माँ ने ही
पारंपरिक अंधविश्वासयुक्त महत्वाकांक्षा के आगे
मेरी संवेदनाओं और
पूरे होने जा रहे
भावी सपनों को
यूँ ही टूटने और बिखरने दिया ।

डॉ रीता
आया नगर,नई दिल्ली- 47

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Rita Singh
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नाम - डॉ रीता जन्मतिथि - 20 जुलाई शिक्षा- पी एच डी (राजनीति विज्ञान) आवासीय पता - एफ -11 , फेज़ - 6 , आया नगर , नई दिल्ली- 110047 आत्मकथ्य - इस भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों को सनातन बनाए रखने की कल्पना ही कलम द्वारा कुछ शब्दों की रचना को प्रेरित करती है , वही शब्द रचना मेरी कविता है । .

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One comment
  1. निज के भौतिक सपनों के बिगड़ते परिदृश्यों की कुण्ठा में लिखा गया काव्य मां को विषयवस्तु बनाकर काव्यकार की दृढ़ता का बोध कराता है। काव्य आगे किसी मोड़ तक आगे जाने की अपेक्षा करता है।समाज को विद्रूपित करने वाले ऐसे आवश्यक विषय जागृति के लिए लाने के लिए काव्यकार को बधाई।