¤¤¤ जैहिंद के दोहे ¤¤¤

दिनेश एल०

रचनाकार- दिनेश एल० "जैहिंद"

विधा- दोहे

जैहिंद के दोहे —

होई मुग्ध जग सारा, देखि सुधर तन-रूप ।
मुख बिचकाए संसार, मुखड़ा देखि कुरूप ।।

देखे सूरत सब कोय, लखे न सीरत कोय ।
जे देखे सीरत सबहिं, दुख काहे के होय ।।

रश्मि ले नीलम चमके, चमके गोरी-रूप ।
झूम उठे विश्व सारा, पा के दिनकर-धूप ।।

एक वक्त एक कारज, ना करियो दो-चार ।
एक लक्ष्य पे रहियो, पइहों कबहुँ न हार ।।

कुरसी पाई पगलाय, अँखियाँ मूँदी सोय ।
भाँड़ में गइलैं जनता, मंतरी चाँदी होय ।।

जग में दो बहु-रूपिये, बदले रूप हजार ।
एक हँसाय दुनिया को, एक ठगय संसार ।।

सेवक हमहिं कह-कह के, बनै प्रभु श्रीराम ।
कौनो सुविधा_खुदे लैं, _पीछे जनता नाम ।।

भाँत-भाँत अणु-रूप है, चहूँ ओर है छूट ।
मन धरे जे चख ले तू , मन में आवे लूट ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
06. 10. 2017

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दिनेश एल०
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मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का अंग बना लिया और निरंतर कुछ न कुछ लिखते रहने की एक आदत-सी बन गई | फिर इस तरह से लेखन का एक लम्बा कारवाँ गुजर चुका है | लगभग १० वर्षों तक बतौर गीतकार फिल्मों मे भी संघर्ष कर चुका,,

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